कुत्सा का सुख
राजकिशोर
हममें से किसे
नहीं पता है कि हममें से हरएक के बारे में हमसे छिपा कर क्या-क्या नहीं कहा जाता।
इसमें कुछ सही होता है और कुछ झूठ। इन कल्पनाजीवियों की खास निगाह अपने परिचितों और सहयोगियों के यौन
जीवन पर होती है। पुरुष-स्त्री का प्रेम उनका निजी मामला है। तब भी जब दोनों
विवाहित हों या उनमें से एक विवाहित हो। लेकिन समाज को इन संबंधों के बारे में
किस्से गढ़ने में बहुत मजा आता है। प्रेम और सेक्स आनंददायी हैं, इसलिए उनके बारे में चर्चा करना भी आनंददायी
होता है। कई बार पुरुष अपने झूठे-सच्चे किस्से सुना कर वाहवाही लूटना चाहता है,
मानो स्त्री-विजय कोई बहुत
बड़ी उपलब्धि हो। ऐसे पुरुषों के लिए स्त्रियां ट्रॉफियों की तरह होती हैं।
इन किस्सों को ध्यान से सुना जाता है और स्मृति में संजो कर आगे बढ़ा दिया जाता है।
कह सकते हैं कि यह मानव स्वभाव है। जानकारी से ज्यादा गप फैलाने में सभी को मजा
आता है। निजता के अधिकार पर कुत्सा का सुख भारी पड़ता है।
एक समय था जब ‘रंगीला रसूल’ नाम की किताब हिन्दी समाज में खूब फैली हुई थी।
इस पुस्तक का उद्देश्य हजरत मुहम्मद को बदनाम करना था। जाहिर है, इसकेपीछे मुस्लिम समुदाय के प्रति नफरत थी।
इसके जवाब में कृष्ण के बारे में किताब लिखी गई, जिसका उद्देश्य यह दिखाना था कि वे कितने
छैल-छबीले थे और कितनी हजार औरतों से उनके रिश्ते थे। इसके पीछे भी सत्य का संधान
नहीं, बल्कि हिन्दू
समाज में जिस चरित्र को भगवान माना जाता है, उसकी छीछालेदार करना था। ये दोनों किताबें आज कहां
हैं? सांप्रदायिकता के गहरे
दिनों में भी कुत्सा जगाने वाली इन दोनों किताबों की लोकप्रियता बढ़ना तो दूर,किसी को उनकी याद तक नहीं आई। समय का फैसला
होता है, तो समय की धूल भी
होती है।
जरूरी नहीं कि हर वक्त सत्य का पलड़ा
ही भारी पड़ता हो। कई बार झूठी बातें इतने शक्तिशाली ढंग से कही जाती हैं कि वे
हमारी चेतना में कहीं चिपकी रह जाती हैं। तथ्य के मुकाबले अफवाह हमेशा ज्यादा
आकर्षक होती है। इसकी एक बहुत बड़ी वजह यह मान लेना है कि सभी की अलमारियों में
कंकाल छिपे होते हैं। हो सकता है, यह सच भी हो। पर बिना किसी ठोस सबूत के इस तरह के दुष्प्रचार समाज के वातावरण
को गंदला करते हैं और मनुष्य के मूलतः पतित होने के यकीन को पक्का करते हैं। इसका
सबसे दूषित पक्ष यह है कि जिस पर चरित्रहीनता का आरोप लगाया जाता है, उसे अपनी सफाई देने का मौका ही नहीं मिलता। कोई
हवा से कैसे लड़ सकता है? क्या वह अपने हर परिचित को सचाई बताता चले? या अखबार में छपवा दे कि मैं वैसा नहीं हूं जैसा
मुझे बताया जा रहा है? विडंबना यह है कि
इस तरह के स्पष्टीकरण लोगों के शक को और मजबूत करते हैं। ऐसी सफाइयों को दाढ़ी में
तिनका होने का प्रमाण माना जाता है। झूठ से लड़ना हिमालय से टकराना है।
समस्या तब बहुत गंभीर हो जाती है जब
यह कुत्सा प्रेम महापुरुषों को अपने जहरीले जाल में समेटने की कोशिश करता है।
सुकरात के बारे में कहा जाता है कि वे समलैंगिक थे। आइंस्टीन के बारे में मान्यता
है कि वे अपने परिचय के दायरे में आने वाली किसी भी आकर्षक स्त्री को शायद ही छोड़ते
थे।हमारे यहां जवाहर लाल नेहरू के बारे में तरह-तरह की किंवदंतियां सुनी जाती हैं।
इस पंक्ति में महात्मा गांधी को आते देख कर बहुतों को खुशी होती है – उन्हें कुछ ज्यादा ही जो गांधी को अच्छी निगाह
से नहीं देखते। सेंट अगस्टीन और रूसो की तरह महात्मा गांधी भी अपने बारे में सब कुछ
बता गए हैं। लेकिन लोगों को इससे संतोष नहीं है।
गांधी की महानता की तारीफ करते हुए शोधकर्ता और विद्वान गांधी के व्यक्तित्व
के ऐसे पहलुओं को निरावृत करने की कोशिश करते रहते हैं जिनसे उनके अंधेरे पक्ष
आलोकित होते हों। सनसनी का यह इस्तेमाल किताब की बिक्री बढ़ाने के लिए भी होता
है।
इन विवादास्पद प्रसंगों में सर्वाधिक
लोकप्रिय है गांधी द्वारा विवस्त्र
महिलाओं और लड़कियों के साथ सोना। जब यह बात लोगों को पता चली – पता चलना ही था, क्योंकि गांधी जी ब्रह्मचर्य के ये प्रयोग बंद
कमरे में नहीं करते थे -- तब काफी
उत्तेजना फैली। इतनी कि गांधी जी अपने तर्क को नहीं मनवा सके और भक्तों के दबाव में
आ कर उन्हें अपने जीवन के अंतिम दिनों का यह प्रयोग छोड़ना पड़ गया। लेकिन कुछ ही
दिनों के लिए। अपने प्रयोगों पर उन्हें इतनी आस्था थी कि उन्होंने दुबारा इन्हें
शुरू कर दिया। इस बार मामला और गरम हो गया। गांधी जी से तर्क-वितर्क करने वालों में
सबसे आगे थे उनके परम भक्त और प्रिय शिष्य निर्मल कुमार बोस। दोनों के बीच लंबा
पत्र व्यवहार हुआ। अंत में असहमत और नाखुश बोस ने गांधी जी का साथ छोड़ दिया। बोस
ने यह सारी कहानी अपनी पुस्तक ‘माइ डेज विद गांधी’ में किया है। यह पुस्तक अब भी
किसी-किसीपुस्तकालय में मिल जाती है।
हाल ही में गांधी जी के इस खास पहलू पर नई किताब आई
है जो सेफ लेलीवेल्ड की ‘ग्रेट सोल : महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया’। बताते हैं कि यह पुस्तक भारत में उपलब्ध नहीं
है। पर उसमें क्या है, यह बहुतों को पता लग गया है। इसका आधार है विदेश में छपी इस पुस्तक की समीक्षा।
हालांकि लेलीवेल्ड ने इनकार किया है, पर इस समीक्षा में ऐसे अनेक प्रसंग और उद्धरण दिए गए हैं,
जिनका संकेत है कि गांधी
जी समलैंगिक भी थे। इस बिना पर गुजरात सरकार ने इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया है,
जिसकी व्यापक आलोचना हुई
है। किताबों पर सरकारी प्रतिबंध लगा देने से वे मर नहीं जातीं।
आश्चर्यकी बात है कि आज जब
समलैंगिकता को कानूनी मान्यता मिल चुकी है, गांधी जी की समलैंगिकता के संकेत मात्र से उनके
भक्तों में खलबली मच गई है। गांधी जी के निजी जीवन की खोजबीन क्यों नहीं होनी चाहिए?
हर आदमी की अपनी मान्यता
हो सकती है कि झूठ क्या है और सत्य क्या है। झूठ होगा तो अपने आप दब जाएगा। सच होगा,
तब भी गांधी का
व्यक्तित्व इतना बड़ा है कि छोटे-मोटे प्रसंग उस पर दाग नहीं लगा सकते। गांधी के
भक्तों को उनका वकील बनने का प्रयास नहीं करना चाहिए।अगर गांधी अपनी रक्षा खुद
नहीं कर सकते, तो दूसरे उनकी
रक्षा कभी नहीं कर सकते।
sir har baar ki tarh es baar bhi aapne bahut accha lekh aur nihsandeh ek sujhav mila....sir aapse guzarish hai k aap janandolan aur hindi kavita par bhi kuchh likhen aur visheshkar telangana,naxalbani aut sampurna kranti aandolan ko lekar jo kavi kavitayen likhe hain...
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