शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013


शरयू फाल्‍के ने किया दादासाहब फाल्‍के को याद

विश्‍वविद्यालय में पांच दिवसीय फिल्‍म ऐ‍प्रीसिएशन कोर्स का उदघाटन

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के नाटयकला एवं फिल्‍म एवं फिल्‍म अध्‍ययन विभाग द्वारा आयोजित पांच दिवसीय फिल्‍म ऐप्रीसिएशन कोर्स के उदघाटन समारोह में बतौर मुख्‍य अतिथि भारतीय सिनेमा के जनक दादासाहब फाल्‍के की पौत्री शरयू फाल्‍के ने दादासाहब को याद करते हुए उनके जीवन और फिल्‍म दुनिया में दिए उनके योगदान पर प्रकाश डाला। वर्धा विश्‍वविद्यालय में 18 से 22 अप्रैल की अवधि में इस कोर्स का संचालन किया जा रहा है जिसमें देशभर के 150 से भी अधिक फिल्‍म प्रेमी सहभागी हुए हैं। उदघाटन समारोह में दादासाहब द्वारा बनायी गयी पहली मूक फिल्‍म राजा हरिश्‍चंद्र और और कालिया मर्दन का प्रदर्शन किया गया। कोर्स का उदघाटन कुलपति‍ विभूति नारायण राय ने हबीब तनवीर सभागार में किया। इस अवसर पर विशिष्‍ट अतिथि फिल्‍म निदेशक असीम सिन्‍हा, संस्‍कार देसाई, कुलसचिव डॉ. कैलाश खामरे, अजित राय, नाट्यकला एवं फिल्‍म अध्‍ययन विभाग के अध्‍यक्ष प्रो. सुरेश शर्मा मंचासीन थे।
दादासाहब फाल्‍के की जीवनीकार शरयू फाल्‍के ने कहा कि दादासाहब ईश्‍वर, कला और देश पर बेहद प्‍यार करते थे। फिल्‍म के प्रति वे बड़े उत्‍साहित रहते थे और वे फरफेक्‍शनिस्‍ट थे। मुंबई के जे.जे. स्‍कूल ऑफ आर्ट में पढ़कर उन्‍होंने कला में महारत हासिल की और बाद में फोटोग्राफी का कोर्स कर लिया। मुंबई में रहते हुए उन्‍होंने फिल्‍म एक छोटी फिल्‍म बनायी और वहीं से भारतीय सिनेमा की शुरूआत का कारवां शुरू हुआ। उन्‍होंने 1913 में राजा हरिश्‍चंद्र बनायी जिसके लिए उन्‍हें 25 हजार का खर्च आया और यह व्‍यय उनकी पत्‍नी सरस्‍वती के गहने गिरवी रखकर किया गया था। इस फिल्‍म के लिए महिला की भूमिका अन्‍ना सालुंखे नामक व्‍यक्ति निभाई थी। उनका फिल्‍म का सफर लगभग बीस साल तक चलता रहा।
इस अवसर जुबैदा के सहायक दिग्‍दर्शक असीम सिन्‍हा, कोर्स के समायोजक अजित राय तथा संस्‍कार देसाई ने भी फिल्‍म के 100 साल के सफर पर अपनी बात रखी। कुलपति विभूति नारायण राय ने अपने उदबोधन में कहा कि जीवन और दुनिया को समझने के लिए फिल्‍म से बड़ा कोई माध्‍यम नहीं है। कोर्स के लिए युवाओं के उत्‍साह को देखते हुए उन्‍होंने कहा कि आगे चलकर यह कोर्स लंबे समय के लिए भी तैयार किया जाएगा। उदघाटन समारोह में देशभर से आए प्रतिभागी, अध्‍यापक, अधिकारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्‍या में उपस्थित थे।     

तीन स्तरों पर किया जाता है अनुवाद- प्रो.ठाकुरदास

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ में आयोजित त्रि-दिवसीय कार्यशाला के दूसरे दिन आयोजित परिचर्चा में मुख्य वक्ता प्रो.ठाकुरदास जी ने मशीनी अनुवाद , अनुवाद पर विस्तृत चर्चा की उन्होंने कहा कि अनुवाद और अनुवाद विश्लेषण तीन स्तरों पर किया जाता है .शब्द स्तर ,पदबंध स्तर और वाक्य स्तर . आज हमारे पास उपलब्ध टैक्नोलोजी आधी अधूरी है.अनुवाद के लिए सिस्टम विकसित करने के लिए कंम्प्यूटर इंजिनीयर के साथ भाषा वैज्ञानिक की भी भूमिका है. इसके पश्चात प्रो. अनिल अंकित राय ने जनसंचार माध्यम और अनुवाद विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि आज मीडिया में अनुवादकों के लिए रोजगार की अनंत संभावनाएं हैं . पहले मीडिया भाषा की अस्मिता को बचाता था , आज वह व्यवसाय से ज्यादा जुड़ गया है .श्री अंकित राय ने विभिन्न टीवी चैनल के उदाहरण देते हुए अनुवाद की भूमिका पर चर्चा की . प्रशिक्षण सत्र में लीला विभाग के प्रभारी श्री गिरीश पाण्डेय ने प्रतिभागियों को एन्कोडिंग सिस्टम की जानकारी दी और युनिकोड , आस्की, इस्की अथवा विश्वविद्यालय द्वारा विकसित किये गए विभिन्न सॉफ्टवेयर को प्रशिक्षण द्वारा समझाया. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. देवराज ने की . कार्यक्रम का संचालन डॉ अन्नपूर्णा सी. ने किया. 

प्रो.नामवर सिंह ने किया राहुल सांकृत्‍यायन सृजन पीठ में पुस्‍तकालय भवन का शिलान्‍यास

राहुल सांकृत्यायन एवं आज का समय पर विद्वानों ने किया विमर्श
साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ’, मऊ के तत्वावधान में चन्द्रापुरम् कालोनी, भुजौटी सिविल लाइन्स, मऊ के परिसर में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) के कुलाधिपति एवं हिंदी साहित्य के शीर्ष आलोचक प्रो. नामवर सिंह द्वारा पुस्तकालय भवन का शिलान्यास किया गया।
उदघाटन समारोह में अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य देते हुए प्रो.नामवर सिंह ने कहा कि- एक प्रचलित मुहावरा है, ‘‘घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध’’। अर्थात् राहुल जी का महिमामंडन बाहर तो बहुत हुआ, परंतु अपने घर में जिस तरह से उन्हें प्रतिष्ठित होना चाहिए था, वह नहीं हो सके। आज का आयोजन यह सिद्ध करता है कि उन्हें उनके घर में महत्वपूर्ण ढंग से पहली बार याद किया जा रहा है। इसके लिये राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ बधाई के पात्र हैं। यह बड़ा काम किया जा रहा है। अकेले के वश का नहीं है। इसमें सभी लोगों को हाथ लगाना होगा, आम जनता को आगे आना होगा।
राहुल सांकृत्यायन की स्मृतियों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि, राहुल जी महापण्डितशब्द को पसंद नहीं करते थे, क्योंकि वे जानते थे कि काशी की परंपरा में यह शब्द मूर्ख का पर्याय होता है। राहुल मूलतः लोक के दूत थे। उन्हें भोजपुरी और लोक भाषाओं से लगाव था। वे दुनिया की 36 भाषाओं के जानकार थे। वे लोकभाषा व बोलियों की स्वतंत्रता के पक्ष में थे। भोजपुरी बिरहा गायक बिसराम और बुंदेली के इसुरी पर लिखकर उन्होंने साबित किया कि उनके भीतर एक विराट लोकमन जीवित है। इस प्रकार अनेकानेक प्रसंगों को उद्धृत करते हुए नामवर सिंह ने राहुल सांकृत्‍यायन के निजी जीवन से लेकर यात्रा-प्रसंगों, राजनीतिक-दृष्टि से लेकर लोक-पीड़ा व साहित्य-समझ से लेकर सांस्कृतिक विस्तार तक पर व्यापक वक्तव्य दिया।
बतौर मुख्य अतिथि महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा किआज वर्ण-व्यवस्था की जकड़ जो ढीली हो रही है। इसके मूल में राहुल जी की तत्कालीन पहल रही है। आज के समय में राहुल जी के कार्यों और विचारों की प्रासंगिकता है तथा प्रत्येक काल खण्ड में यह प्रासंगिकता बनी रहेगी। उनके विचार सर्वदेशिक व सर्वकालिक है। राहुल जी के कार्यों को आगे बढ़ाया जाना बेहद जरूरी है। उन्होंने जिस बेहतर दुनिया, बेहतर समाज और बेहतर मनुष्य का सपना देखा था। उस सपने को सार्थक करने की दिशा में राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ-मऊये यह भरोसा दिलाया है कि राहुल जी के सपने को सार्थक करने में सह संस्था अपने दृढ़ संकल्प के साथ निरंतर प्रयत्नशील रहेगी। इस प्रयत्न और प्रयास में रामानन्द सरस्वती पुस्तकालय, जोकहरा-आजमगढ़ का सहयोग निरंतर बना रहेगा।
विशिष्ट अतिथि के रूप में आलोचक निर्मला जैन ने कहा कि समाज, साहित्य व संस्कृति की बेहतरी के लिए राहुल जी द्वारा किए गए कार्यों में उनका वैशिष्ट्य दिखाई देता है। महाचेता राहुल जी की घुमक्कड़ी वृत्ति में उन्हें दुनिया की अनेक भाषाओं, बोलियों, संस्कृतियों और समाज को नजदीक से देखने का मौका दिया। इस मौके ने राहुल जी के व्यक्तित्व को रूपांतरित करने का कार्य किया है। अनेक देशों से दुर्लभ पाण्डुलिपियों और ज्ञान-संपदा को भारत ले आने का राहुल जी का काम उनकी क्षमता को दर्शाता है। ऐसे महाचेता, महापंडित राहुल जी के काम को आगे बढ़ाने का संकल्प राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठव धूमकेतु जी को बड़ा साबित करता है।
प्रो.चौथी राम यादव ने राहुल जी के व्यापक व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए उनके भाषा-ज्ञान, दुर्गम यात्राएं व यायावर जीवन के कठिन-सरल रोचक व सारगर्भित प्रसंगों को याद किया। उन्होंने राहुल जी के भोजपुरी-ज्ञान व दृष्टि की चर्चा करते हुए नारी-दुर्दशा पर राहुल जी के कारुणिक भोजपुरी गीत का हवाला देते हुए कहा कि तत्समय में समाज की नारी-दृष्टि संकुचित थी। राहुल जी उस करुणा को भोजपुरी जैसी बोली में व्यक्त कर समाज के भीतर मनुष्यता को जिन्‍दा करने की कोशिश कर रहे थे। संवेदना के ऐसे संकट पूर्ण दौर में वे एक वंचित समाज की रचनात्मक लड़ाई को बड़े ही कारगर ढंग से लड़ रहे थे। ऐसे जुझारू व्यक्तित्व के धनी राहुल जी की 50वीं पुण्यतिथि पर उनको इस तरह से याद करना, निश्चित रूप से उनके काम की महत्ता को समझना है। ऐसी समझदारी के लिए सृजनपीठको साधुवाद।
साहित्‍यकार भारत भारद्वाज ने राहुल जी पर गुणाकर मुले की दो कृतियों का उल्लेख करते हुए उन्हें पढ़ने की अनिवार्यता पर बल दिया और कहा कि राहुल जी के विराट व्यक्तित्व व कृतित्व को इतने कम समय के संवाद में समेटा नहीं जा सकता है। निरंतर चर्चा राहुल जी के तमाम छुए, अनुछुए पहलुओं को उद्घाटित करने का मौका देती है। हमें राहुल जी की कृतियों के पुनर्पाठ की जरूरत है। राहुल जी पर चर्चाएं व शोध का सुयोग उपस्थित कराकर सृजन पीठ ने राहुल की के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है।
महापंडित राहुल सांकृत्यायन की पुण्यतिथि के इस अवसर पर राहुल सांकृत्यायन एवं आज का समयविषयक गोष्ठी का संचालन शिव कुमार पराग ने किया तथा सीपीआई के राष्‍ट्रीय सचिव अतुल कुमार अंजान आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर प्रो.संतोष भदौरिया (इलाहाबाद), श्रीप्रकाश मिश्र (इलाहाबाद), सुरेन्द्र राही, हीरा लाल (इलाहाबाद), प्रो. दिनेश कुशवाहा (रीवां), डॉ. अदनान बिस्मिल्लाह (नई दिल्ली), राकेश श्रीमाल (वर्धा), उत्तर प्रदेश प्रलेस के महासचिव डॉ. संजय श्रीवास्तव (वाराणसी), नरेन्द्र पुण्डरीक (बांदा) जैसे महत्वपूर्ण बाहर से आये साहित्यकारों के अतिरिक्त स्थानीय साहित्यकार, पत्रकार, बुद्धिजीवी व समाज सेवियों में प्रमुख रूप से- डॉ. ए. के. मिश्रा, संजय राय, उत्तम चन्द, श्याम बिहारी श्यामल’, नागेन्द्र राय, हरिद्वार राय, डॉ. संजय राय, शतानन्द उपाध्याय, दयाशंकर तिवारी, गिरीशचन्द मासूम, अर्चना उपाध्याय, हरिशंकर यादवअभय’, डॉ. वसीमुद्दीन जमाली, विष्णुलाल गुप्त, जितेन्द्र कुमार मालवीय, जितेन्द्र मिश्र काका’, पुरूषार्थ सिंह, नरेन्द्र सिंह बागी, अरूण कुमार सिंह, मृत्युंजय तिवारी, स्वामीनाथ पाण्डेय, एस.पी.भारती, कु. शैलजा श्रीवास्तव, मदन सिंह, तैय्यब पालकी, डॉ. एस. एन. खत्री, डॉ. सरफराज, अरविन्द मूर्ति, का. ओमप्रकाश सिंह, बसन्त, का. विरेन्द्र कुमार, शमसुलहक चौधरी, फहीम खां, अजीम खां, ओमप्रकाश गुप्ता, देवेन्द्र मिश्र, का. रामऔतार सिंह, हरेराम सिंह, श्रीराम चौधरी, जलीस अहमद, शेषनाथ राय, प्रकाशचन्द सिंह, हिना देसाई, रामहर्ष मौर्य, पी.एन. सिंह, सत्यप्रकाश सिंह, हरिनारायण चौहान, रामनारायण सिंह, डॉ. रवीन्द्र यादव, डॉ. रामकृष्ण यादव, डॉ. श्रीप्रकाश सिंह, डॉ. डी. एन. सिंह, रमाशंकर सिंह, बी. डी. शुक्ला, रविभूषण पाठक, बृजराज सिंह, सिसौदिया, सुरेश पाण्डेय, कान्ती लाल शर्मा, मदनलाल श्रीवास्तव, सुशील कुमार पाण्डेय, गोपाल शरण पाण्डेय, राजेश्वरी राय, मीना राय, आशुतोष राय, कु. अर्पिता राय व सारांश राघव की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013


वैचारिक प्रतिबद्धता और जुझारु एकता आज की जरूरत : विभूति नारायण राय



जब हम किसी आंदोलन के विमर्श और विरासत की बात करते है तो ट्रेजिकसेन्‍स के बारे में सोचते हैं या नहीं यह महत्वपूर्ण है कभी भी कोई कला या रचना विचार का उल्‍था नहीं होती। अनुवाद नहीं होती। इसके लिए मुखर एवं मुक्‍त चिंतन होना जरूरी है। मंटो और फैज से हमे सीखना चाहिए जिनके यहां विचारधारा और अनुभव को अलग से पहचानना संभव नहीं है। ये बातें महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय द्वारा प्रलेस के सहयोग से आयोजित बीसवीं सदी का अर्थ: जन्‍मशती का संदर्भ शीर्षक के अन्‍तर्गत प्रगतिशील आंदोलन : विर्मश और विरासत विषयक उद्घाटन सत्र में कहीं। उद्घाटन सत्र के मुख्‍य अतिथि वरिष्‍ठ उपन्‍यासकार एवं विश्‍वविद्यालय के कुलपति श्री विभूति नारायण राय ने कहा कि ईश्‍वर और विचारधारा के अन्‍त की घोषणाएं हो रही हैं। चौतरफा हमला है, बाजार नियामक शक्ति की भूमिका में आ रहा है और प्रगतिशील आंदोलन को निराशा की स्थिति में नहीं आना चाहिए। प्रगतिशील आंदोलन की नये सिरे से पड़ताल हो। सभी मुक्तिकामी शक्तियां एकजुट होकर समस्‍त पूंजीवादी शक्तियों का विरोध करें। इसमें और अधिक शक्ति हमारी साझा एवं गंगा जमुनी संस्‍कृति से आ सकती है। उद्घाटन सत्र में विषय की प्रस्‍तावना रखते हुए प्रलेस के राष्‍ट्रीय महासचिव अली जावेद ने कहा कि जब लोगों ने साहित्‍य को ड्राइंग रूम तक सीमित करने की कोशिश की तो प्रगतिशीलन आंदोलन सामाजिक बदलाव का जरिया बना। उसने तहरीक की शक्‍ल में कारगर भूमिका का निर्वाह किया। प्रेमचन्‍द तनक़ीद के साथ हुश्‍न का मियार बदलना चाहते थे। मुख्‍य वक्‍ता प्रसिद्ध आलोचक खगेन्‍द्र ठाकुर ने कहा कि महफिल सजाना अदीबों का काम नही है यह प्रेमचन्‍द बहुत पहले कह चुके हैं। प्रेमचन्‍द को घृणा का प्रचारक कहा गया मगर उन्‍होंने समाज को बदलने का काम अपनी कलम के द्वारा जारी रखा। प्रगतिशील आंदोलन मशाल दिखाने का काम करता है। समारोह के विशिष्‍ट अतिथि अकील रिज़वी ने कहा कि प्रेमचन्‍द्र का आग्रह था कि जिन्‍दगी में जो हो रहा है उसी को साहित्‍य में पेश करें। खयाल की दुनिया में रहने वाला अदब ठीक नही होता। समाज जिस राह से गुजर रहा है, उसी की बात करें।

कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया ने किया। अतिथियों का स्‍वागत श्री पीयूष पातंजलि, प्रकाश त्रिपाठी, अविनाश मिश्र ने किया। 
      तरक़्क़ी पसंद तनक़ीद : हक़ीकत और नज़रिया पर आधारित प्रथम सत्र की अध्‍यक्षता करते हुए अक़ील रिज़वी ने कहा कि साहित्‍य में समाज की सच्‍चाई और काव्‍य सुन्‍दरता नहीं है तो साहित्‍य का कोई मतलब नहीं है। सत्र की शुरूआत दिल्‍ली से आईं अर्जुमन्‍द आरा के आधार वक्‍तव्‍य से हुआ, उन्‍होंने कहा कि साहित्‍य का अध्‍ययन आधारगत होता है जो वैज्ञानिक तौर पर करना चाहिए तरक्‍क़ी पसंद तनक़ीद ने यही शिक्षा दी है। उनका वक्‍तव्‍य साहित्‍य के सामाजिक संदर्भों एवं प्रगतिशील लेखक संघ के इतिहास वर्णन पर आ‍धारित था। वक्‍ताओं में नगीना जदीन ने एहतेशाम हुसैन की तनक़ीदी क्षमता और समझ के बारे में वर्णन किया, उन्‍होंने बताया कि वह पहले आलोचक है जिन्‍होंने साहित्‍य को दूसरे संदर्भों से जोड़ने की कोशिश की। दूसरे वक्‍ता के रूप में वाराणसी के मुहम्‍मद अख्‍तर ने एहतेशाम हुसैन की आलोचनात्मक दृष्टि पर प्रकाश डाला साथ ही संक्षेप में उनके व्‍यक्तित्‍व का भी वर्णन किया। कानपुर से आए खान अहमद फारूक ने कहा कि साहित्‍य बिना सामाजिक तत्‍वों के आगे नहीं बढ़ सकता। उन्‍होंने अपने वक्‍तव्‍य में बताया कि एहतेशाम हुसैन ने विश्‍व स्‍तर के साहित्‍यकारों और बुद्धिजीवियों से बातचीत का सिलसिला जारी रखा और इस तरह भारतीय साहित्‍य की आलोचनात्‍मक दृष्टि पैदा की। बी.एच.यू. के आफताब अहमद आफाकी ने इस आयोजन के लिए महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय को मुबारक बाद दी, कि एहतेशाम हुसैन एवं अली सरदार जाफरी जैसे भारतीय साहित्‍य की परंपरा के प्रमुख आलोचक व कवि साहित्‍यकार पर इतना बड़ा आयोजन किया। उन्‍होंने अपने वक्‍तव्‍य में हिंदी उर्दू के रिश्‍तों की घनिष्‍ठता को बताते हुए समाज और सहित्‍य के संबंधों पर चर्चा की। सत्र का संचालन ए.ए. फातमी ने किया तथा स्‍वागत नीलम शंकर ने किया।
जन्‍मशती समारोह के दूसरे दिन दूसरे सत्र की अध्‍यक्षता करते हुए वरिष्‍ठ आलोचक खगेंद्र ठाकुर के अनुसार जीवन को ताकत प्रदान करने का एक मजबूत तरीका साहित्यिक रचना है। अली सरदार जाफ़री और एहतेशाम हुसैन जैसे तमाम प्रगतिशील साहित्‍यकार ने अपने पूरे जीवन काल में इसी की कोशिश करते रहे। दूसरे सत्र के आधार वक्‍तव्‍य में ए.ए. फातमी ने कहा कि सरदार जाफ़री की बड़ी शायरी का अध्‍ययन आलोचकों ने गंभीरता से किया ही नहीं, अली सरदार जाफ़री के यहां अनीस, इकबाल, जोश, आदि का मिला जुला आहंग बड़े तौर पर देखने को मिलता है। उन्‍होंने अपने इस आधार वक्‍तव्‍य में बताया कि प्रगतिशील आंदोलन के लेखको ने पुरानी और भक्ति परंपरा को खंगाला और नये दौर का साहित्‍य रचा। वक्‍ता के रूप में जगदीश नरायन ने बताया कोई भी साहि‍त्यिक रचना हमारी त्रासदियों मुसीबतों को दूर न‍हीं कर सकती लेकिन त्रासदियों और मुसीबतों के समय में बड़ा सहारा जरूर देती हैं। अली सरदार जाफरी ने हिन्‍दुस्‍तान की संपूर्ण चिंता से साहित्‍य का संबंध स्‍थापित किया। बाराबंकी से आये राजेश मल्‍ल ने कहा कि भारत की सांस्‍कृतिक विरासत को बचाये रखने पर जोर दिया, उन्‍होंने बताया कि अली सरदार जाफरी और प्रगतिशील आंदोलन के सभी साहित्‍यकारों ने उसी विरासत को बचाये रखने का काम किया। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से आये अबू बकर अब्‍बाद ने सरदार जाफरी और उनकी कहानीयों पर चर्चा करते हुए प्रगतिशील आंदोलन की प्रक्रियाओं का उल्‍लेख किया। शकील सिद्दीकी ने हिंदी उर्दू के बीच की दूरियां कम करने में विश्‍वविद्यालय की मुख्‍य भूमिका की चर्चा करते हुए प्रगतिशील आंदोलन की सामाजिक भूमिकाओं का विस्‍तार से उल्‍लेख किया। इस सत्र का संचालन सुरेद्र राही ने किया, संजय श्रीवास्‍तव ने अतिथियों का स्‍वागत किया।
      जन्‍मशती समारोह के समाहार सत्र की अध्‍यक्षता करते हुए महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के कुलपति एवं वरिष्‍ठ उपन्‍यासकार विभूति नारायण राय ने कहा कि आज की सारी बड़ी ताकतें गलत विचारों को बढ़ावा देने में लगी हैं जिस पर सभी बुद्धिजीवियों को जुझारू रूप से प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करने की जरूरत है। उन्‍होंने अपने विचारों में ये बात रखी कि मार्क्‍सवाद हमेशा आशावादी होता है, जबकि बड़ी रचना वैचारिक प्रतिबद्धता और ट्रेजिकसेन्‍स से पनपती है, फिर मार्क्‍सवादी साहित्‍य बड़ी साहित्यिक परंपरा भी रखता है। वक्‍ताओं में अली जावेद, ए.ए. फातमी, खगेन्‍द्र ठाकुर ने अपने समाहार वक्‍तव्‍य में साहित्यिक आंदोलनों और प्रगतिशील आंदोलन की परंपराओं और भविष्‍य की चिंताओं तथा साहित्यिक चुनौतियों पर प्रकाश डाला। सत्र के विशिष्‍ट अतिथि कामरेड जियाउल हक राजनीतिक चेतना की जानकारी पर श्रोताओं का ध्‍यान केंद्रित कराते हुए इतिहास की बहुत सी यादों को प्रगतिशील आंदोलन और विचारों से जोड़ते हुए नई दिशा की बात की। उन्‍होंने कहा कि सामाजिक सड़ांध को दूर करना बहुत बड़ा कर्तव्‍य होगा, आज की भ्रष्‍टाचार संस्‍कृति के खिलाफ अपनी चिंता व्‍यक्‍त करते हुए राजनीतिक संघर्षों को तेज करने का आह्वान किया।
सत्र का संचालन संजय श्रीवास्‍तव ने किया तथा स्‍वागत सुरेन्‍द्र राही ने किया। दो दिवसीय समारोह की समाप्ति पर जन्‍मशती समारोह के संयोजक क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया ने दूर दराज से आये सभी अतिथिओं वक्‍ताओं एवं श्रोताओं का कार्यक्रम में भागीदारी हेतु धन्‍यवाद दिया। जन्‍मशती समारोह में दोनों दिन प्रमुख रूप से जिआउल हक, अनीता गोजेश, हरिश्‍चन्‍द्र पाण्‍डेय, हरिश्‍चन्‍द्र अग्रवाल, रविनंदन सिंह, सीमा आजाद, विश्‍वविजय, धनंजय चोपड़ा, डॉ. मुहम्‍मद नईम, अजित पुष्‍कल, जम़ीर अहसन, फज़्ले हसनैन, शेलेन्‍द्र प्रताप सिंह, अर्जुमंद आरा,  अनुपम आनन्‍द, नंदल हितैषी, अविनाश मिश्रा, सुरेद्र राही, असरार गांधी, ख्‍वाजा जावेद अख्‍तर, फखरूल करीम, सालिहा जर्रीन, संजय पांडेय, श्रीप्रकाश मिश्र, गुफरान अहमद खां, अशरफ अली बेग, जेपी मिश्रा, नीलम शंकर, असरफ अली बेग, सहित बडी संख्‍या में साहित्‍य प्रेमी उपस्थित रहे।


बुधवार, 3 अप्रैल 2013

इतिहासरस और किस्सागोई का अदभुत उदाहरण है प्रेम की भूतकथा- दूधनाथ सिंह 

उपन्‍यास प्रेम की भूतकथा पर गोष्‍ठी



महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालयवर्धा के इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र द्वारा ‘ख्‍यातनाम साहित्‍यकार विभूति नारायण  राय के ज्ञानपीठ से प्रकाशित उपन्‍यास  प्रेम की भूत कथा पर गोष्‍ठी का आयोजन किया गया।
गोष्‍ठी की अध्‍यक्षता कर रहे वरिष्‍ठ साहित्‍यकार दूधनाथ सिंह ने कहा कि यह उपन्‍यास उपन्‍यासकार के अनुभव जगत में कैसे आया यह महत्‍वपूर्ण है। उपन्‍यास को पढ़कर मैं बहुत चकित हुआ। विभूति नारायण राय उम्‍दा किस्‍म के किस्‍सागो हैंउन्‍होंने प्रेम की भूतकथा में नयी डिवाईस और तकनीक का इस्‍तेमाल किया है। उपन्‍यास में अदभुत कथारस हैमोड हैसंरचनाएं हैं। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने इसे इतिहासरस कहा है। उपन्‍यास में इतिहासरस से अदभुत साक्षात्कार होता है। उन्‍होंने अपने पूर्व के उपन्‍यासों के कथा तत्‍व और शिल्‍प से स्‍पष्‍ट डिपार्चर किया हैउपन्‍यास का गद्य कवित्‍वमय है। मुख्‍य वक्‍ता प्रो.ए.ए.फातमी ने कहा किउपन्‍यास में न्‍याय-व्‍यवस्‍था पर गहरा तंज हैप्रेम के किस्‍से के साथ जिदगी की कशमकश को भी साथ रखा गया है। प्रेम कथा सामाजिक सरोकार को साथ लेकर चलती है।
उदयपुर की डॉ.सरवत खान (जिन्होंने उपन्‍यास का उर्दू में अनुवाद किया है) ने कहा कि आजकल बहुत कुछ लिखा जा रहा है किंतु मुहब्‍बत कि कहानियां नजर नहीं आतीविभूति जी के प्रेम चित्रण में फन झलकता है। यह उपन्‍यास जादुई यथार्थवाद का सफल नमूना है। उन्‍होंने इस उपन्‍यास को उर्दू वालों के लिए बहुत अहम बताया।
उपन्‍यास के लेखक विभूति नारायण राय ने अपनी रचना प्रकिया को साझा करते हुए कहा कि गुलेरी की कहानी उसने कहा था में प्रेम का उत्‍सर्ग मेरे लिए हमेशा रोमांचकारी रहा। उस कहानी में मेरे इस उपन्‍यास के लेखन में उत्‍प्रेरक का काम किया यह उपन्‍यास मेरे कई वर्षों के शोध का परिणाम है। उन्‍होंने इसके पढ़े जाने और पसंद किए जाने के लिए पाठक वर्ग का आभार भी व्‍यक्त किया।
वक्‍ता हिमांशु रंजन ने प्रेम की भूतकथा को बड़े कैनवास की कथा कहा उन्‍होंने कहा कि उपन्‍यास कार ने इतिहास और परंपरा से ग्रहण करने का विवेक रखा हैशिल्‍प के लिहाज से उनका यह बहुत महत्वपूर्ण उपन्‍यास है। डॉ.गुफरान अहमद खान ने उर्दू वालों के लिए इस उपन्‍यास को एक जरूरी उपन्‍यास कहा। गोष्‍ठी का संयोजन एवं संचालन क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया ने किया। स्‍वागत डॉ. प्रकाश त्रिपाठी ने किया। गोष्‍ठी में प्रमुख रूप से जिआउल हकहरिश्‍चन्‍द्र पाण्‍डेयहरिश्‍चन्‍द्र अग्रवालनंदल हितैषी, फखरूल करीमजेपी मिश्रानीलम शंकरसंतोष चतुर्वेदीसुरेद्र राहीअसरफ अली बेगप्रवीण शेखरहीरालालअविनाश मिश्रारविनंदन सिंहशैलेन्‍द्र सिंहमनोज सिंहअनिल भदौरियाबी.एन. सिंह सहित बड़ी संख्‍या में साहित्‍य प्रेमी उपस्थित रहे।

शुक्रवार, 22 मार्च 2013


 साहित्‍य विभाग में मुस्लिम विमर्श पर व्‍याख्‍यान

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के साहित्‍य विभाग में मुस्लिम विमर्श पर व्‍याख्‍यान का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में बतौर मुख्‍य वक्‍ता मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के हिंदी विभाग के अध्‍यक्ष प्रो. टी. वी. कट्टीमनी उपस्थित रहे। साहित्‍य विभाग के अध्‍यक्ष प्रो. कृष्‍ण कुमार सिंह ने कार्यक्रम की अध्‍यक्षता की।
     प्रो. टी. वी. कट्टीमनी ने भारत की सामाजिक, सांस्‍कृतिक बहुलता पर प्रकाश डाला। उन्‍होंने कहा कि भारत में धार्मिक आधार पर सांप्रदायिक पहचान को रेखांकित करना अत्‍यंत कठिन है। इस संदर्भ में उन्‍होंने कहा कि विभिन्‍न प्रदेशों के मुस्लिम समाज की भाषा धार्मिक आधार पर नहीं अपितु वहाँ के स्‍थानीय (क्षेत्रीय) आधार पर तय होती है। प्रो. कट्टमनी ने कहा कि हम जिस इतिहास को परंपरागत पाठ्यक्रम के रूप में पढ़ते-पढ़ाते हैं वह हमारे समाज का समुचित प्रतिनिधित्‍व नहीं करना। साथ ही हमारा इतिहास लेखन भी वस्‍तुनिष्‍ठ नहीं है। कट्टीमनी ने तथ्‍यों के साथ इस ऐतिहासिक मिथक को खारिज किया कि हिंदू मंदिरों को लूटने वाले सिर्फ मुसलमान थे। उन्‍होंने बताया कि हिंदू मंदिरों को हिंदू राजाओं ने भी लूटा।
     साहित्‍य विभाग के अध्‍यक्ष प्रो. कृष्‍ण कुमार सिंह ने अपने अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में मुस्लिम विमर्श के महत्‍व को रेखांकित किया। कार्यक्रम में साहित्‍य विभाग के प्रो. रामवीर सिंह, असोसिएट प्रो. प्रीति सागर, सहायक प्रो. रामानुज अस्‍थाना, प्रो. अशोकनाथ त्रिपाइी, प्रो. रूपेश कुमार सिंह, प्रो. वीरपाल सिंह यादव, प्रो. सुनील कुमार सुमन तथा कवि एवं संपादक जयप्रकाश धूमकेतु सहित शोधा‍र्थी एवं विद्यार्थी भारी संख्‍या में उपस्थित रहे।  

शुक्रवार, 15 मार्च 2013


हिंदी विश्‍वविद्यालय में आज से दूर शिक्षा पर तीन दिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, नई दिल्‍ली के संयुक्‍त तत्‍वावधान  में दि. 16 से 18 मार्च के बीच दूर शिक्षा निदेशालय की ओर से दूर शिक्षा की सामाजिक प्रासंगिकता विषय पर  राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया है। संगोष्‍ठी का उदघाटन शनिवार को तीन बजे हबीब तनवीर सभागार में कुलपति  विभूति नारायण की अध्‍यक्षता में होगा।
इस अवसर पर दूर शिक्षा निदेशालय के  निदेशक तथा प्रतिकुलपति प्रो. ए. अरविंदाक्षन स्‍वागत वक्‍तव्‍य देंगे। उदघाटन वक्‍तव्‍य प्रो. नागेश्‍वर राव, पूर्व कुलपति, राजर्षि टंडन मुक्‍त विश्‍वविद्यालय, इलाहाबाद करेंगे। उदघाटन के बाद ‘दूर शिक्षा:अतीत, वर्तमान’ विषय पर विमर्श होगा। सत्र की अध्‍यक्षता प्रो. मनोज कुमार करेंगे। बीज तथा आधार वक्‍तव्‍य प्रो. सत्‍यकाम तथा मुख्‍य वक्‍तव्‍य डॉ. जे. पी. राय देंगे। सत्र में वक्‍ता के रूप में  डॉ. चित्रा माली, अनुपमा कुमारी, रूद्रेश नारायण मिश्र, मोहम्‍मद आमिर पाशा उपस्थित रहेंगे।
17 मार्च 10 बजे से को दूर शिक्षा: भविष्‍य की सम्‍भावनाएँ विषय पर आयोजित सत्र की अध्‍यक्षता प्रो. नागेश्‍वर राव करेंगे। मुख्‍य वक्‍तव्‍य प्रो. वी. के. श्रीवास्‍तव प्रस्‍तुत करेंगे। वक्‍ता के रूप में पुरंदर दास, अर्चना शर्मा, मेघा मंडल, शंभू शरण गुप्‍त, डॉ. रितुरानी उपस्थित रहेंगे। तृतीय सत्र वैकल्पिक व पूरक शिक्षा बनाम पारंपरिक शिक्षा विषय पर होगा जिसकी अध्‍यक्षता प्रो. सत्‍यकाम करेंगे। प्रो. कमलेश मिश्र मुख्‍य वक्‍तव्‍य देंगे। इस दौरान चंद्रशेखर नाथ झा, आर. टी. बेंद्रे,  संजय खंडेलवाल, नीलेश भगत, राकेश यादव उपस्थित रहेंगे। चतुर्थ सत्र का विषय सामाजिक विज्ञान में शोध की रूपरेखा और संभावनाएँ होगा। इस सत्र में सामाजिक विज्ञान में शोध की रूपरेखा और शोध की संभावनाओं पर भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, नई दिल्‍ली के निदेशक प्रो. के. एल. खेड़ा द्वारा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, नई दिल्‍ली के शोध संबंधी योजनाओं व अनुदानों पर विश्‍वविद्यालय के शिक्षकों और शोधार्थियों से चर्चा करेंगे। पांचवा सत्र ‘शिक्षा का लोकतंत्र : हाशिए के समाज तक दूर शिक्षा की पहुँच’ विषय पर होगा। सत्र की अध्‍यक्षता प्रो. वी. के श्रीवास्‍तव करेंगे। प्रो. रामशरण जोशी मुख्‍य वक्‍तव्‍य देंगे। वक्‍ता के रूप में डॉ. निशीथ राय, डॉ. विधु खरे दास, शंभू जोशी, डॉ. लोकेश श्रीवास्‍तव, राजेंद्र कटारे, रेणु कुमारी, कालूलाल कुलमी, प्रशांत कड़वे उपस्थित रहेंगे।
18 मार्च को 10 बजे से दूर शिक्षा की तकनीक और पाठय-सामग्री की गुणवत्‍ता का सवाल विषय पर विमर्श होगा। सत्र की अध्‍यक्षता प्रो. संतोष भदौरिया करेंगे। मुख्‍य वक्‍तव्‍य डॉ. रवींद्र टी. बोरकर करेंगे। वक्‍ता के रूप में शैलेश मरजी कदम, डॉ. अशोक नाथ त्रिपाठी, मनोहर लाल, सुश्री अर्चना नामदेव,  शालिनी धुर्वे उपस्थित रहेंगे। संगोष्‍ठी का समापन 12.15 बजे होगा जिसकी  अध्‍यक्षता कुलपति विभूति नारायण राय करेंगे। समाहार वक्‍तव्‍य विश्‍वविद्यालय के निदेशक एवं प्रतिकुलपति प्रो. ए. अरविंदाक्षन देंगे। इस अवसर पर मुख्‍य अतिथि  के रूप में भारत भूषण, निदेशक, दूरस्‍थ शिक्षा परिषद, नई दिल्‍ली उपस्थित रहेंगे।